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फेसबुक का पेज माफिया

मानव  सभ्यता के  उदगम  से  ही  मनुष्य को “सामाजिक प्राणी”  माना जाता  रहा हैं. दिमाग पर ज़्यादा   ज़ोर  ना  पड़े  इसीलिए  सुविधानुसार  चाहे  तो मानव सभ्यता का उदगम MDH वाले अंकल या आडवाणी जी के जन्म से भी मान सकते है।.वैसे लगातार असामाजिक हरकतों के बावजूद भी अपने “सामाजिक प्राणी” होने के स्टेटस को बचा ले जाना मनुष्य के संकल्प से ज़्यादा इसकी “ढिठता ” को दर्शाता हैं।

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भूतकाल में “सामाजिक प्राणी” कहे जाने के पीछे कई कारण रहे होंगे लेकिन वर्तमान में शोध करने पर यहीं नज़र आता हैं की जो प्राणी कांग्रेस जैसी पार्टी को 65 साल तक  सत्ता में सहन कर सकता , अनु मालिक /अल्ताफ राजा के म्यूजिक को हिट बताये जाने को सह सकता है , उदय चोपड़ा और तुषार कपूर की फिल्मो के प्रोमो सह सकता है , नवज्योत सिद्धू की कमेंट्री सहन कर लेता हैं, मोदी जी के मुंह से अहिंसा और शरद पवार के मुंह से ईमानदारी का महत्व सहन कर सकता है और इतना सहन करने के बाद भी उफ्फ न करते हुए अपने दिल पर राहुल गांधी की अक्ल पर पड़े हुए पत्थर से भी बड़ा पत्थर रखते हुए हिमालय जाने का विचार अपनी गैस सब्सिडी की तरह त्याग देता हैं लेकिन फिर भी  अपने परिवार और समाज का साथ सिर्फ इसीलिए नहीं छोड़ता हैं ताकि उसके प्रोफाइल पिक पर लाइक -कंमेंट्स कम न हो।

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सोशल मीडीया  ने मनुष्य की सामाजिकता को नए आयाम दिए हैं.  टैग करने, पोक करने  और ग्रुप चैट में ऐड करने जैसे घोर असामाजिक कार्यो को  सोशल मीडीया ने जिस आसानी  से  सामाजिकता का प्रश्रय  दिया हैं उतनी आसानी से  तो  धर्मनिरपेक्ष  सरकारे अवैध बांग्लादेशियो  को भी   प्रश्रय नहीं दे  पाती हैं।

फेसबुक पर सक्रीय “पेज माफिया”  को भी इसी कड़ी में जोड़कर देखा जाना चाहिए।   क्रांति का डिजिटल रूप  आजकल फेसबुक पेजेस पर ठीक वैसे   ही देखने को मिलता हैं जैसे बिहार की सड़को पर किडनैपर्स . क्लास के मॉनिटर  से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव तक  के  परिणाम   का अंदाज़ा   आपको  केवल पेज पर आने वाले लाइक और कॉमेंट्स  से मिल जाता हैं।  देश प्रेमी होने  का प्रणाम पत्र लेना हो  या फिर  भगवान की कृपा   प्राप्त  करनी  हो , इसके लिए अब ग्लोबल वार्मिंग के  ज़माने  में इवन -ओड नंबर की गाड़ी में  दौड़धूप करने की बिलकुल  ज़रूरत नहीं हैं ,  इन सबके के लिए बस आपको   पलक  झपकते  ही  (मतलब  देखते ही )   लाइक  ,कमेंट  और शेयर  करना होता हैं।

ज़्यादातर वहीँ लोग  “पेज एडमिन”  बन करके क्रांति की ध्वजा पताका लहरा रहे हैं जो क्लासरूम में मुर्गा बना करते थे . कई पेजेस की  पोस्ट्स तो   “सुरेश -रमेश”  से भी  ज़्यादा  “मिलती-जुलती”  हैं।  कई  जानकर लोगो का ये भी मानना   हैं इन सारे पेजेस को  मिलाकर एक  किताब बना दी जाये तो उसका नाम केवल “कॉपी  पेस्ट” ही रखा जा सकता हैं।

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फेसबुक पर कई  तरह  के पेजेस  बनते  हैं  पर  जिस  गति से  पब्लिक फिगर वाले  पेज  बन रहे हैं उसे देखकर लगता हैं की  2020 तक केवल अरविन्द केजरीवाल ही देश में  आम आदमी  बचेंगे।  इन  लोगो को समझना चाहिए की अपना   पब्लिक फिगर वाला पेज बनाना इतना बड़ा नैतिक अपराध नहीं हैं जितना की  पब्लिक फिगर होते हुए भी (खुद को समझते हुए भी )   दूसरो को पेज लाइक करने के  लिए इनवाइट्  करना। अगर ऐसे लोग भी पब्लिक फिगर वाला पेज बनाये जिन्हे अपने घर में एंट्री भी पैन कार्ड /आधार कार्ड दिखाने पर मिलती हो तो त्रिनेत्र खोलने के लिए भगवान शिव से प्रार्थना के लिए  हाथ अपने आप उठ जाते हैं।

अपने  आपको  पॉलिटिशियन मानने वाले भी इससे पीछे नहीं हैं , पॉलिटिशियन वाले पेजेस को देखकर लगता  है की आजकल  राजनेता  बनने  के  लिए किसी पार्टी की प्राथमिक  सदस्यता  लेना उतना ज़रूरी नहीं हैं जितना  फेसबुक  पर  पॉलिटिशियन  वाला पेज बनाना। बाकि सब तो ठीक हैं लेकिन अगर वो लोग भी  पॉलिटिशियन बन  रहे  हो  जिनका खुद का  नाम  वोटिंग  लिस्ट में ना हो तो इंसानियत के साथ साथ टेक्नोलॉजी पर से भी भरोसा उठ जाता हैं।

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इसी  प्रकार  म्यूजिशियन , ब्लॉगर और कम्युनिटी वाले पेजेस भी एक सामान्य फेसबुक अकाउंट होल्डर से लाइक और कमेंट का  हफ्ता वसूलने वाले माफिया से अधिक कुछ  नहीं हैं।

सम्मन का सम्मान और राजनैतिक पुनर्जीवन

जब एक राजनैतिक पार्टी के अध्यक्षा और उपाध्यक्ष  को भ्रष्टाचार के  मामले  में कोर्ट से सम्मन  मिला तो  डायनासोर से भी पुरानी पार्टी  के कार्यकर्त्ता इसे सम्मन के बदले   सम्मान समझने लगे. कुछ वरिष्ठ नेताओ (जो मार्गदर्शक मंडल में रखे जाने की उम्र भी  पार कर चुके है) ने  अपनी  जाती  टीवी पर  बताए  जाने की शर्त पर मीडिया वालो से  कहाँ की , “ये मुद्दा पार्टी में ठीक उसी तरह से जान फूंक सकता हैं जिस तरीके से पार्टी  सत्ता में रहते हुए देश फूंका करती थी और  पार्टी  को इस मामले में  “जीरो -लोस्” होगा”.  लेकिन पार्टी के अध्यक्षा और उपाध्यक्ष , सम्मन  मिलने से ज़्यादा  इस  बात से  दुखी बताए जाते थे की  इस तरह  के  छोटे मामलो मे  नाम उछलने से पार्टी और परिवार की बड़े घोटाले करने की क्षमता पर सवाल न खड़े हो जाये.

पार्टी  के  सारे  कार्यकर्त्ता कोर्ट  में पेशी के दिन का ठीक ऐसे ही इंतज़ार कर रहे थे जैसे  EMI के बोझ तले दबा आम आदमी   हर महीने 1  तारीख  को  मोबाइल में सैलरी क्रेडिट होने के मैसेज  का करता हैं। इस मामले में अपने अध्यक्षा और उपाध्यक्ष का बचाव करने के बजाय न्यूज़ चैनल्स पर पार्टी के सारे  प्रवक्ता  ऐसे  आक्रामक  दिख  रहे थे  मानो उन्हें टीवी  डिबेट करने  नहीं बल्कि टी -ट्वेन्टी  मैच में पावर-प्ले  के दौरान बैटिंग  करने भेजा गया हो। पार्टी  के सारे कार्यकर्ताओ और नेताओ का  आचरण  देखकर लगता  था की  इनके घर के  सारे  “चम्मच”  इनके खिलाफ  मानहानि का दावा ना कर दे।

पूरे देश से कार्यकर्ता ,पार्टी मुख्यालय पर ऐसे जुटने लगे मानो  समुद्र मंथन के बाद वहां अमृत की बुँदे बंट रहीं हो .अन्ना  के भ्रष्टाचार  विरोधी आंदोलन  में लाखो  की  भीड़,  “जंतर -मंतर”  पर जाने  के लिए  उमड़ी थी पर मानो  इस पार्टी के कार्यकर्ताओ की भीड़ अपने नेताओ पर भ्रष्टाचार के आरोप छू -मंतर  करने के लिए  उमड़ी थी।

कोर्ट में  पेशी के दिन,   नेताओ  और कार्यकर्त्ता की  बॉडी लैंग्वेज  देखकर  ये अंदाज़ा  लगाना  मुश्किल था की  उनके  अध्यक्षा और उपाध्यक्ष भ्रष्टाचार के केस में पेशी पर जा रहे हैं या  फिर ” डांस इंडिया डांस” में  ऑडिशन देने .  कोर्ट  जाते समय में  जिस तरह से नेता और कार्यकर्त्ता  अपने अध्यक्षा और उपाध्यक्ष  को  घेर  कर  चल  रहे  थे उससे लगता था की  ये कहीं  अतिउत्साह में गोला बनाकर एकदम  गरबा   ना  खेलने ना जाये।

पार्टी   के  कुछ  जोशीले  सदस्य  आगे , अध्यक्षा और उपाध्यक्ष की तस्वीर हाथ में लिए ” तुझ में  रब  दिखता  हैं”  गाना  गाते  हुए  चल  रहे  थे।   उल्लेखनीय  हैं की  पार्टी से राजसभा टिकट की आस लगाये बैठे कुछ  समाज और देशी सेवी लोग इस गाने को पार्टी का “एंथम-सांग” बनाने  लिए “कई  बार आमरण -अनशन”  भी कर चुके हैं।

कोर्ट पहुँचते ही आरोपियों को  उतनी ही देर में  ज़मानत  मिल गई जितने देर उनको अपनी पार्टी  की अध्यक्षा और उपाध्यक्ष   बनने में लगती हैं और फिर  पार्टी के कार्यकर्ताओ ने इस अभूतपूर्व विजय का  विजयी  जुलुस  निकाला और ज़मीन पर लौट कर “नागिन- डांस” किया ताकि जनता में सन्देश दिया जा सके की पार्टी  और  इसका  नेतृत्व अभी भी ज़मीन से जुड़ा हैं।