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I am a Chartered Accountant and a Company Secretary by profession. Love to read and write humor and sarcasm.

मिमिक्री से कानून की किरकिरी

कॉमेडियन किकू शारदा को बाबा राम रहीम की मिमिक्री करने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन बड़ा सवाल यह हैं की जब बाबाजी खुद  सार्वजनिक रूप से अपनी इतनी बेइज्जती कर चुके हैं तो फिर  किसी के पास उनकी बेइज़्ज़ती करने के लिए बच क्या जाता हैं। बाबाजी के समर्थको ने किकू शारदा के लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग की हैं हालांकि उन्हें ये पता नहीं हैं की बाबाजी का समर्थक बनकर सबसे बड़ी सजा तो वो खुद भुगत  रहे हैं। किकू शारदा के परिवार और रिश्तेदारो ने किकू का बचाव करते हुए  कहाँ की, “किकू बचपन से ही बड़ा टैलेंटेड है और मिमिक्री करने में तो  इतना निपुण हैं की बिना कुछ करे ही नितिन गडकरी की मिमिक्री कर लेता हैं।”

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कई लोगो ने तो कड़ी सजा के रूप में किकू शारदा को बाबाजी द्वारा अभिनीत फिल्मे दिखाने की भी मांग की हैं लेकिन कानून के जानकारों के अनुसार इतने छोटे अपराध के लिए इतनी वीभत्स सजा देने से देश के उस कानून की बड़ी बदनामी होगी जिसने अँधा होने के बावजूद याकूब मेमन जैसो के लिए आधी रात को अपने दरवाज़े खोल दिए थे. कई कानूनी विशेषज्ञों ने तो अपना नाम न बताये जाने की शर्त पर बताया की बाबाजी की फिल्मो में इतना पोटेंशियल हैं की उन्हें “रेयरेस्ट ऑफ रेयर केसेस” में फांसी की सजा के विकल्प के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता हैं।

सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रीय “अनसोशल -लोगो” का मानना हैं की, अगर कीकू शारदा, बाबाजी की नकल कऱने की बजाय फेसबुक/ट्विटर पर पोस्ट्स/ट्वीट्स की नकल करते तो गिरफ्तार होने के बदले बडे लेखक कहलाते. कला जगत से जुड़े लोगो का कहना हैं की, “मिमीक्री एक कठीन साधना है, दिग्विजय सिहं को ही देख लिजीए, इतने साल बाद भी इंसान होने की मिमीक्री अच्छे से नही कऱ पाते।” वहीँ बाबा रामदेव को जानने वाले लोगो का सोचना था की अगर किकू  शारदा बाबा राम रहीम के बदले बाबा रामदेव की मिमिक्री करते तो बाबा रामदेव नाराज़ होने के बजाय किकू शारदा से कहते, “और करो, करने से होगा”और हो सकता था खुश होकर पतंजलि नूडल्स के एक -दो पैकेट्स भी दे डालते।”

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बाबा राम रहीम के एक नज़दीकी भक्त ने बताया की बाबाजी अपनी मिमिक्री करने से नाराज़ नहीं हुए बल्कि उन्हें नाराज़ी इस बात हुई की कहीं किकू शारदा मिमिक्री के बहाने उनकी आने वाले फिल्म की स्क्रिप्ट ना सार्वजनिक कर दे जो बाबाजी की शक्तियों की तरह ही गुप्त हैं। मिमिक्री पर बाबाजी के  गुस्से को जायज़ ठहराने के लिए कई भक्त/समर्थक मिमिक्री को कोर्ट के उस निर्णय की अवमानना बता रहे हैं जिसमे  कोर्ट ने “ज़लीकट्टू  पर्व” को  बैलो के  प्रति क्रूर बताते  हुए उस पर प्रतिबंध लगाया था और बैलो के प्रति मानवता पूर्ण व्यवहार का आदेश दिया था।

वहीँ कुछ पत्रकार (धर्म के कालम में “कैपिटल और बोल्ड” में “मूर्खता” लिखनेवाले) जो “मालदा- दंगो” को अभिव्यक्तता की स्वंतंत्रता बताते हुए अभी थकान भी नहीं उतार पाये थे, वे किकु शारदा का बचाव करने जितनी जल्दी मैंदान में उतरे उतनी जल्दी तो उनके चेहरे से नकाब भी नहीं उतरते। वैसे ये पत्रकार अभिव्यक्त्ति की स्वंत्रतता के इतने बड़े पक्षधर हैं की अपने ऊपर सवाल उठाने वाले लोगो को तब तक सोशल मीडिया पर ब्लॉक नहीं करते जब तक “लोग इन” करके  सवाल देख ना ले.

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बाबा जी के समर्थको ने किकु शारदा की गिरफ़्तारी करवा के एक अच्छा काम ये किया हैं की अब बाबाजी की फिल्मे बाबाजी की तुलना में कम घटिया लगेगी और लोग देखने का मन बना सकते हैं। वैसे इस सारे प्रकरण से ये बात सिद्ध हो जाती हैं की बाबाजी जैसे “साधु- संत” लोक कल्याण (चाहे वो फ़िल्मी मनोरंजन के माध्यम से ही क्यों ना हो) के लिए अपनी सारी प्रतिष्ठा भी दाव पर लगा सकते हैं। वैसे किकु शारदा तो ज़मानत पर छूट गए लेकिन उन्हें गिरफ्तार कराने वाले अपनी “अमानत” बाबाजी की नई फिल्म  के लिए गिरवी रखकर अभी भी बाबा की गिरफ्त में बने हुए।

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फेसबुक का पेज माफिया

मानव  सभ्यता के  उदगम  से  ही  मनुष्य को “सामाजिक प्राणी”  माना जाता  रहा हैं. दिमाग पर ज़्यादा   ज़ोर  ना  पड़े  इसीलिए  सुविधानुसार  चाहे  तो मानव सभ्यता का उदगम MDH वाले अंकल या आडवाणी जी के जन्म से भी मान सकते है।.वैसे लगातार असामाजिक हरकतों के बावजूद भी अपने “सामाजिक प्राणी” होने के स्टेटस को बचा ले जाना मनुष्य के संकल्प से ज़्यादा इसकी “ढिठता ” को दर्शाता हैं।

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भूतकाल में “सामाजिक प्राणी” कहे जाने के पीछे कई कारण रहे होंगे लेकिन वर्तमान में शोध करने पर यहीं नज़र आता हैं की जो प्राणी कांग्रेस जैसी पार्टी को 65 साल तक  सत्ता में सहन कर सकता , अनु मालिक /अल्ताफ राजा के म्यूजिक को हिट बताये जाने को सह सकता है , उदय चोपड़ा और तुषार कपूर की फिल्मो के प्रोमो सह सकता है , नवज्योत सिद्धू की कमेंट्री सहन कर लेता हैं, मोदी जी के मुंह से अहिंसा और शरद पवार के मुंह से ईमानदारी का महत्व सहन कर सकता है और इतना सहन करने के बाद भी उफ्फ न करते हुए अपने दिल पर राहुल गांधी की अक्ल पर पड़े हुए पत्थर से भी बड़ा पत्थर रखते हुए हिमालय जाने का विचार अपनी गैस सब्सिडी की तरह त्याग देता हैं लेकिन फिर भी  अपने परिवार और समाज का साथ सिर्फ इसीलिए नहीं छोड़ता हैं ताकि उसके प्रोफाइल पिक पर लाइक -कंमेंट्स कम न हो।

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सोशल मीडीया  ने मनुष्य की सामाजिकता को नए आयाम दिए हैं.  टैग करने, पोक करने  और ग्रुप चैट में ऐड करने जैसे घोर असामाजिक कार्यो को  सोशल मीडीया ने जिस आसानी  से  सामाजिकता का प्रश्रय  दिया हैं उतनी आसानी से  तो  धर्मनिरपेक्ष  सरकारे अवैध बांग्लादेशियो  को भी   प्रश्रय नहीं दे  पाती हैं।

फेसबुक पर सक्रीय “पेज माफिया”  को भी इसी कड़ी में जोड़कर देखा जाना चाहिए।   क्रांति का डिजिटल रूप  आजकल फेसबुक पेजेस पर ठीक वैसे   ही देखने को मिलता हैं जैसे बिहार की सड़को पर किडनैपर्स . क्लास के मॉनिटर  से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव तक  के  परिणाम   का अंदाज़ा   आपको  केवल पेज पर आने वाले लाइक और कॉमेंट्स  से मिल जाता हैं।  देश प्रेमी होने  का प्रणाम पत्र लेना हो  या फिर  भगवान की कृपा   प्राप्त  करनी  हो , इसके लिए अब ग्लोबल वार्मिंग के  ज़माने  में इवन -ओड नंबर की गाड़ी में  दौड़धूप करने की बिलकुल  ज़रूरत नहीं हैं ,  इन सबके के लिए बस आपको   पलक  झपकते  ही  (मतलब  देखते ही )   लाइक  ,कमेंट  और शेयर  करना होता हैं।

ज़्यादातर वहीँ लोग  “पेज एडमिन”  बन करके क्रांति की ध्वजा पताका लहरा रहे हैं जो क्लासरूम में मुर्गा बना करते थे . कई पेजेस की  पोस्ट्स तो   “सुरेश -रमेश”  से भी  ज़्यादा  “मिलती-जुलती”  हैं।  कई  जानकर लोगो का ये भी मानना   हैं इन सारे पेजेस को  मिलाकर एक  किताब बना दी जाये तो उसका नाम केवल “कॉपी  पेस्ट” ही रखा जा सकता हैं।

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फेसबुक पर कई  तरह  के पेजेस  बनते  हैं  पर  जिस  गति से  पब्लिक फिगर वाले  पेज  बन रहे हैं उसे देखकर लगता हैं की  2020 तक केवल अरविन्द केजरीवाल ही देश में  आम आदमी  बचेंगे।  इन  लोगो को समझना चाहिए की अपना   पब्लिक फिगर वाला पेज बनाना इतना बड़ा नैतिक अपराध नहीं हैं जितना की  पब्लिक फिगर होते हुए भी (खुद को समझते हुए भी )   दूसरो को पेज लाइक करने के  लिए इनवाइट्  करना। अगर ऐसे लोग भी पब्लिक फिगर वाला पेज बनाये जिन्हे अपने घर में एंट्री भी पैन कार्ड /आधार कार्ड दिखाने पर मिलती हो तो त्रिनेत्र खोलने के लिए भगवान शिव से प्रार्थना के लिए  हाथ अपने आप उठ जाते हैं।

अपने  आपको  पॉलिटिशियन मानने वाले भी इससे पीछे नहीं हैं , पॉलिटिशियन वाले पेजेस को देखकर लगता  है की आजकल  राजनेता  बनने  के  लिए किसी पार्टी की प्राथमिक  सदस्यता  लेना उतना ज़रूरी नहीं हैं जितना  फेसबुक  पर  पॉलिटिशियन  वाला पेज बनाना। बाकि सब तो ठीक हैं लेकिन अगर वो लोग भी  पॉलिटिशियन बन  रहे  हो  जिनका खुद का  नाम  वोटिंग  लिस्ट में ना हो तो इंसानियत के साथ साथ टेक्नोलॉजी पर से भी भरोसा उठ जाता हैं।

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इसी  प्रकार  म्यूजिशियन , ब्लॉगर और कम्युनिटी वाले पेजेस भी एक सामान्य फेसबुक अकाउंट होल्डर से लाइक और कमेंट का  हफ्ता वसूलने वाले माफिया से अधिक कुछ  नहीं हैं।

खेल में राजनीती या राजनीती का खेल

हमारे  देश  में खेल और राजनीती दोनों ऐसे  घुले -मिले  हुए  हैं  जैसे डेल्ही  की  हवा और प्रदुषण, मोदी जी  और अच्छे  दिन , बाबा  रामदेव और स्वदेशी। क्रिकेट  के  इतने  लोकप्रिय  होने  के बावजूद हॉकी अभी भी हमारा राष्ट्रीय खेल सिर्फ इसीलिए बना हुआ है क्योंकि अब ये मैदानों  के  बजाय  खेल संघो/संस्थाओ में  खेला जाता हैं (अपने विरोधियो  के खिलाफ गोल करने के लिए) और हॉकी  स्टिक  का उपयोग अब गोल  करने के  बजाय घायल  करने  में  होता हैं।

हॉकी की गिरती  हुई  लोकप्रियता को सँभालने के लिए  कई  पूर्व  हॉकी खिलाड़ियों ने सन्नी देओल से रिक्वेस्ट की हैं की वो अपनी आगामी फिल्म “घायल वन्स अगेन’ के एक्शन सीन्स में हॉकी स्टिक  का बहुतायत से प्रयोग करे।

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हमारे खेल संघो पर  अकसर भ्रष्टाचार , अकर्मण्यता  और तानाशाही के  आरोप  लगते  हैं  लेकिन ये आरोप निराधार किस्म के हैं क्योंकि खेल संघ भारतीय सवैंधानिक  मान्यतो के सबसे बड़े रक्षक हैं क्योंकि  यहाँ बिना किसी  दलगत, जातिगत और धार्मिक  भेदभाव के  सभी तबको  के  लोगो द्वारा समान  रूप  से  सभी खेलो और खिलाड़ियों के साथ खिलवाड किया जाता हैं.

खेलसंघो में  राजनेताओ  के प्रवेश का  विरोध भी  दुर्भावना  से प्रेरित  हैं।  राजनेता ही खिलाड़ियों  के सच्चे  शुभचिंतक हो सकते हैं क्योकि  खेल  संघो  के राजनैतिक  पदाधिकारो  से  खिलाड़ियों  को “आल-राउंडर” बनने की सीख मिलती हैं,  करोडो का भ्रष्टाचार करके भी  अपना हाज़मा सहीं रखने वाले  राजनेता ही खिलाड़ियों को हमेशा फिट रहने का मंत्र दे सकते हैं ,और तो और खिलाडी राजनेताओ से राजनीती के कुछ गुर सीखकर जल्दी ही  अपनी टीम का  कप्तान भी बन सकते हैं.

अभी हाल ही में बीजेपी ने अपने एक सांसद और पूर्व अंतर्राष्ट्रीय खिलाडी कीर्ति आज़ाद को  अपनी  ही पार्टी  के नेता  पर  खेल संघ में  भ्रष्टाचार  के आरोप लगाने  के  लिए  निलंबित कर दिया , पार्टी का  कहना हैं की उनको  भ्रष्टाचार  के आरोप  लगाने का कोई अधिकार नहीं हैं क्योंकि उन्होंने खिलाडी रहते हुए जितने  रन बनाये होंगे उससे ज़्यादा तो मोदी जी विदेशी दौरे कर चुके हैं और मार्गदर्शक  मंडल से  मदद  मांगने   के बाद भी  “कीर्ति  प्राप्त करने” और “आज़ाद रहने का” अधिकार बीजेपी के सविंधान और मजबूत आंतरिक  लोकतंत्र  के खिलाफ  हैं। कीर्ति  आज़ाद को निलंबित करने को , पार्टी भ्रष्टाचार के विरुद्ध बड़ी जीत बता रहीं हैं क्योकि पार्टी  का शुरू से मानना रहा हैं की भ्रष्टाचार एक ऐसा संक्रामक रोग हैं जो इसका खुलासा  करने से ज़्यादा फैलता है।

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वहीँ कीर्ति आज़ाद का कहना है की मार्गदर्शक  मंडल से मदद मांगना  उनके  लिए  स्वाभाविक  ही था क्योंकि मार्गदर्शक मंडल बीजेपी में  बारहवे  खिलाडी (12th man)  भूमिका  निभाता हैं और  उन्होंने भी अपने अंतराष्ट्रीय क्रिकेट केरियर में  ज़्यादातर  समय  यहीं  भूमिका निभाते हुए  कई ना टूटने वाले रिकॉर्ड  बनाए है ।

वहीँ केजरीवाल का कहना  था हैं की कीर्ति आज़ाद  को  बाहर निकाल  कर  बीजेपी ने  सिद्ध कर  दिया की  वो  भ्रष्टाचार में आकंठ  डूबी हैं, हालांकि उन्होंने   भूषण और यादव को पार्टी  से सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग  के दुष्परिणामों से बचने के लिए निकाला था।

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सम्मन का सम्मान और राजनैतिक पुनर्जीवन

जब एक राजनैतिक पार्टी के अध्यक्षा और उपाध्यक्ष  को भ्रष्टाचार के  मामले  में कोर्ट से सम्मन  मिला तो  डायनासोर से भी पुरानी पार्टी  के कार्यकर्त्ता इसे सम्मन के बदले   सम्मान समझने लगे. कुछ वरिष्ठ नेताओ (जो मार्गदर्शक मंडल में रखे जाने की उम्र भी  पार कर चुके है) ने  अपनी  जाती  टीवी पर  बताए  जाने की शर्त पर मीडिया वालो से  कहाँ की , “ये मुद्दा पार्टी में ठीक उसी तरह से जान फूंक सकता हैं जिस तरीके से पार्टी  सत्ता में रहते हुए देश फूंका करती थी और  पार्टी  को इस मामले में  “जीरो -लोस्” होगा”.  लेकिन पार्टी के अध्यक्षा और उपाध्यक्ष , सम्मन  मिलने से ज़्यादा  इस  बात से  दुखी बताए जाते थे की  इस तरह  के  छोटे मामलो मे  नाम उछलने से पार्टी और परिवार की बड़े घोटाले करने की क्षमता पर सवाल न खड़े हो जाये.

पार्टी  के  सारे  कार्यकर्त्ता कोर्ट  में पेशी के दिन का ठीक ऐसे ही इंतज़ार कर रहे थे जैसे  EMI के बोझ तले दबा आम आदमी   हर महीने 1  तारीख  को  मोबाइल में सैलरी क्रेडिट होने के मैसेज  का करता हैं। इस मामले में अपने अध्यक्षा और उपाध्यक्ष का बचाव करने के बजाय न्यूज़ चैनल्स पर पार्टी के सारे  प्रवक्ता  ऐसे  आक्रामक  दिख  रहे थे  मानो उन्हें टीवी  डिबेट करने  नहीं बल्कि टी -ट्वेन्टी  मैच में पावर-प्ले  के दौरान बैटिंग  करने भेजा गया हो। पार्टी  के सारे कार्यकर्ताओ और नेताओ का  आचरण  देखकर लगता  था की  इनके घर के  सारे  “चम्मच”  इनके खिलाफ  मानहानि का दावा ना कर दे।

पूरे देश से कार्यकर्ता ,पार्टी मुख्यालय पर ऐसे जुटने लगे मानो  समुद्र मंथन के बाद वहां अमृत की बुँदे बंट रहीं हो .अन्ना  के भ्रष्टाचार  विरोधी आंदोलन  में लाखो  की  भीड़,  “जंतर -मंतर”  पर जाने  के लिए  उमड़ी थी पर मानो  इस पार्टी के कार्यकर्ताओ की भीड़ अपने नेताओ पर भ्रष्टाचार के आरोप छू -मंतर  करने के लिए  उमड़ी थी।

कोर्ट में  पेशी के दिन,   नेताओ  और कार्यकर्त्ता की  बॉडी लैंग्वेज  देखकर  ये अंदाज़ा  लगाना  मुश्किल था की  उनके  अध्यक्षा और उपाध्यक्ष भ्रष्टाचार के केस में पेशी पर जा रहे हैं या  फिर ” डांस इंडिया डांस” में  ऑडिशन देने .  कोर्ट  जाते समय में  जिस तरह से नेता और कार्यकर्त्ता  अपने अध्यक्षा और उपाध्यक्ष  को  घेर  कर  चल  रहे  थे उससे लगता था की  ये कहीं  अतिउत्साह में गोला बनाकर एकदम  गरबा   ना  खेलने ना जाये।

पार्टी   के  कुछ  जोशीले  सदस्य  आगे , अध्यक्षा और उपाध्यक्ष की तस्वीर हाथ में लिए ” तुझ में  रब  दिखता  हैं”  गाना  गाते  हुए  चल  रहे  थे।   उल्लेखनीय  हैं की  पार्टी से राजसभा टिकट की आस लगाये बैठे कुछ  समाज और देशी सेवी लोग इस गाने को पार्टी का “एंथम-सांग” बनाने  लिए “कई  बार आमरण -अनशन”  भी कर चुके हैं।

कोर्ट पहुँचते ही आरोपियों को  उतनी ही देर में  ज़मानत  मिल गई जितने देर उनको अपनी पार्टी  की अध्यक्षा और उपाध्यक्ष   बनने में लगती हैं और फिर  पार्टी के कार्यकर्ताओ ने इस अभूतपूर्व विजय का  विजयी  जुलुस  निकाला और ज़मीन पर लौट कर “नागिन- डांस” किया ताकि जनता में सन्देश दिया जा सके की पार्टी  और  इसका  नेतृत्व अभी भी ज़मीन से जुड़ा हैं।

 

 

सोशल मीडीया और प्रचलन प्रधान देश !!!

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हमारा देश एक “प्रचलन – प्रधान” देश हैं और इसी क्रम में आजकल सोशल मीडिया पर हर महीने किसी ना किसी फिल्म का विरोध या समर्थन करने का प्रचलन (ट्रेंड) चल पड़ा हैं। इस ट्रेंड को देखकर लगता हैं आजकल लोग अपना नेट रिचार्ज केवल यहीं पता करने के लिए करवाते हैं की चालू महीने में उन्हें कौनसी फिल्म देखनी हैं और किसका विरोध करना हैं। ये प्रचलन इतना जोरो पर हैं की बढ़ती हुई मंहगाई को देखते हुए कई टेलीकॉम कंपनिया तो ऐसे सस्ते नेट पैक भी लांच करने पर विचार कर रहीं हैं जो सोशल साइट्स पर लोग- इन पर करने पर केवल वहीँ पोस्ट्स / ट्वीट्स दिखाए जो फिल्मो के समर्थन या विरोध से संबधित हैं ताकि वो लोग भी देशभक्त या देशविरोधी बन सके जो महीने भर 1-2 GB डेटा का खर्चा उठाकर स्मार्ट फ़ोन में अपना सर घुसाकर हुए चलते हुए भी गर्व से अपना सर उठा कर अपने को “नेटी-जन” नहीं कह पाते.

सोशल मीडिया पर चल पड़ा ये प्रचलन देश की सुरक्षा एजेंसीज के लिेए सबसे बड़ा वरदान साबित हो रहा हैं क्योंकि अब आईबी और सीबीआई जैसी गुप्तचर संस्थाओ को देश विरोधी तत्वों की जानकारी के लिए देश भर में अपने जासूस नहीं छोडने पडते, अब केवल अपने AC ऑफिस में बैठकर वो पता कर लेते की ट्विटर/फेसबुक पर फलां फिल्म को सपोर्ट करने वाले देश विरोधी हैं और ऐसे देशविरोधी तत्वों की हर गतिविधि को ट्रैक करने करने के लिए पहले की तरह देश के सारे एयरपोर्ट्स और रेलवे स्टेशन को हाई अलर्ट पर रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती अब केवल ऐसे तत्वों के लोग- इन, लोग – आउट और फेसबुक चेक इन्स पर कड़ी निगरानी रखी जाती हैं.

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इसके अलावा , इन संस्थाओ में देशभक्त ऑफिसर्स की भर्ती पहले लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के ज़रिए होती थी जिसमे बहुत समय और सरकारी धन खर्च हो जाता था लेकिन अब इन संस्थाओ में ऐसे जाबांज़ और वफादार ऑफिसर्स की भर्ती हो रहीं है जिनको सोशल मीडिया पर कम कम से 10 ऐसी देश विरोधी फिल्मो को फ्लॉप करवाने का अनुभव हो जिनके गलती से हिट हो जाने पर देश की सुरक्षा और अखंडता को खतरा उत्पन्न हो जाने और देश में आपातकाल लग जाने का सीधा खतरा था। इन संस्थाओं में भर्ती के इच्छुक में लोगो का उत्साह बना रहे इसीलिए ये संस्थाए आजकल भर्ती के समय आपके द्वारा फिल्म के विरोध में लाए गए प्रमुख हथियार (फोटोशॉप्स) की क्वालिटी नहीं केवल क्वांटिटी देख रहीं हैं और ज़्यादा से ज़्यादा लोग देश भक्ति के रास्ते चले और देशप्रेम कम ना हो इसीलिए ये संस्थाए इस तथ्य को भी इग्नोर कर रहीं हैं की आपने फिल्म का भले ही कितना भी विरोध किया हो लेकिन बाद में उस फिल्म को टोरेंट से डाउनलोड करने के लिए कितने लिंक्स बाटे थे और उस फिल्म में काम करने वाली ग्लैमरस हीरोइन के फेसबुक पेज़ पर जाकर उसके कितने फोटो लाइक किये थे।

 

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सोशल मीडिया पर चल रहा हैं ये प्रचलन देश के सामाजिक तानेबाने को भी मजबूती प्रदान कर रहा हैं क्योंक पहले दो लोगो में दोस्ती एक दूसरे को जानने के बाद और समय गुजारने के बाद होती थी लेकिन आजकल जल्दी से उन लोगो में दोस्ती हो जाती है जो सोशल मीडिया पर समान फिल्मो का समर्थन या विरोध करते पाये जाते हैं लेकिन ये दोस्ती तभी टिकती हैं जब आप लगातार बिना शिकायत करे और बिना थके (बिना REVITAL लिए) एक दूसरे की सभी पोस्ट्स और आपस मे एक दूसरे के सभी कॉमेंट्स लाइक और रिप्लाई करे. डिजिटल इंडिया के इस युग में शादी के लिए कुंडली मिलाने का समय दोनों पक्षों के पास नहीं होता हैं इसीलिए ये ट्रेंड आने के बाद लड़के और लड़की के गुण मिलाने के लिए केवल ये देख लिया हैं जाता हैं की वयस्क होने के बाद दोनों ने एक जैसी फिल्मो का समर्थन और विरोध किया था या नहीं।

 

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लेकिन ये ट्रेंड एक दुधारी तलवार की तरह भी पेश आ रहा है इससे रिश्तो में खटास कैंडी क्रश की बिना बुलाई रिक्वेस्ट की तरह आ रहीं हैं। पिछले महीने मेरी सोसाईटी में ही रहने वाली एक ऑन्टी ने मुझसे एक साल तक बात न करने का प्रण लिया क्योंकि उनके इनबॉक्स में मेसेज करने के बाद भी मैंने एक फिल्म के सपोर्ट में पोस्ट नहीं की थी और एक साल का प्रण केवल इसीलिए क्योंकि उस फिल्म का हीरो साल में केवल ही फिल्म करता हैं. हालांकि उन ऑन्टी ने ही बाद में इनबॉक्स में मैसेज करके बताया की वो अपना प्रण तोड़ भी सकती हैं अगर मै उस फिल्म के हीरो के टीवी पर आने वाले रियलिटी शो के रिपीट टेलीकास्ट भी देखना शुरू कर दू . हालांकि मैंने उनका वो मेसेज देश में बढ़ती असहींष्णुता को बनाये रखने के लिए रीड करने के बाद वापस अनरीड कर दिया था।

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राजनितिक हलको में इस ट्रेंड की चर्चा लालु-केज़रीवाल के “भरत -मिलाप” से भी ज़्यादा हैं। भाजपा का कहना हैं की ये ट्रेंड कांग्रेस में गांधी परिवार की चमचागिरी की गति से भी तेज़ी से बढ़ रहा हैं वहीँ कांग्रेस का कहना हैं की ये मोदी जी की विदेश यात्राओं की गति से भी तेज़ गति से बढ़ रहा हैं लेकिन वहीँ आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओ का कहना हैं उन्हें प्रति महीना 20,000 रुपये केवल ये ट्रेंड चलवाने के मिलते हैं, इसकी गति बताने के लिए उन्हें अगले इन्क्रीमेंट का इंतज़ार करना होगा।

इस ट्रेंड ने बोलीवुड के प्रोडूसर्स और डायरेक्टर्स की नीद, रात को स्मार्ट फ़ोन पर आने वाले नोटिफिकेशन्स से भी ज़्यादा उड़ा रखी हैं. सभी प्रोडूसर्स और डायरेक्टर्स ने इसे उदय चोपडा की एक्टिंग की तरह गंभीरता से लेते हुए ये निर्णय किया है की अपनी फिल्मो का सोशल मीडिया पर समर्थन करने वालो के नाम, फिल्म चालू होने से पहले स्क्रीन पर आने नामो में कैमरामैन से नीचे लेकिन स्पॉट बॉय से ऊपर दिखाएंगे और विरोध करने वालो का नाम फिल्म के विलेन से भी ऊपर दिखाया जायेगा।