मिमिक्री से कानून की किरकिरी

कॉमेडियन किकू शारदा को बाबा राम रहीम की मिमिक्री करने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन बड़ा सवाल यह हैं की जब बाबाजी खुद  सार्वजनिक रूप से अपनी इतनी बेइज्जती कर चुके हैं तो फिर  किसी के पास उनकी बेइज़्ज़ती करने के लिए बच क्या जाता हैं। बाबाजी के समर्थको ने किकू शारदा के लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग की हैं हालांकि उन्हें ये पता नहीं हैं की बाबाजी का समर्थक बनकर सबसे बड़ी सजा तो वो खुद भुगत  रहे हैं। किकू शारदा के परिवार और रिश्तेदारो ने किकू का बचाव करते हुए  कहाँ की, “किकू बचपन से ही बड़ा टैलेंटेड है और मिमिक्री करने में तो  इतना निपुण हैं की बिना कुछ करे ही नितिन गडकरी की मिमिक्री कर लेता हैं।”

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कई लोगो ने तो कड़ी सजा के रूप में किकू शारदा को बाबाजी द्वारा अभिनीत फिल्मे दिखाने की भी मांग की हैं लेकिन कानून के जानकारों के अनुसार इतने छोटे अपराध के लिए इतनी वीभत्स सजा देने से देश के उस कानून की बड़ी बदनामी होगी जिसने अँधा होने के बावजूद याकूब मेमन जैसो के लिए आधी रात को अपने दरवाज़े खोल दिए थे. कई कानूनी विशेषज्ञों ने तो अपना नाम न बताये जाने की शर्त पर बताया की बाबाजी की फिल्मो में इतना पोटेंशियल हैं की उन्हें “रेयरेस्ट ऑफ रेयर केसेस” में फांसी की सजा के विकल्प के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता हैं।

सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रीय “अनसोशल -लोगो” का मानना हैं की, अगर कीकू शारदा, बाबाजी की नकल कऱने की बजाय फेसबुक/ट्विटर पर पोस्ट्स/ट्वीट्स की नकल करते तो गिरफ्तार होने के बदले बडे लेखक कहलाते. कला जगत से जुड़े लोगो का कहना हैं की, “मिमीक्री एक कठीन साधना है, दिग्विजय सिहं को ही देख लिजीए, इतने साल बाद भी इंसान होने की मिमीक्री अच्छे से नही कऱ पाते।” वहीँ बाबा रामदेव को जानने वाले लोगो का सोचना था की अगर किकू  शारदा बाबा राम रहीम के बदले बाबा रामदेव की मिमिक्री करते तो बाबा रामदेव नाराज़ होने के बजाय किकू शारदा से कहते, “और करो, करने से होगा”और हो सकता था खुश होकर पतंजलि नूडल्स के एक -दो पैकेट्स भी दे डालते।”

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बाबा राम रहीम के एक नज़दीकी भक्त ने बताया की बाबाजी अपनी मिमिक्री करने से नाराज़ नहीं हुए बल्कि उन्हें नाराज़ी इस बात हुई की कहीं किकू शारदा मिमिक्री के बहाने उनकी आने वाले फिल्म की स्क्रिप्ट ना सार्वजनिक कर दे जो बाबाजी की शक्तियों की तरह ही गुप्त हैं। मिमिक्री पर बाबाजी के  गुस्से को जायज़ ठहराने के लिए कई भक्त/समर्थक मिमिक्री को कोर्ट के उस निर्णय की अवमानना बता रहे हैं जिसमे  कोर्ट ने “ज़लीकट्टू  पर्व” को  बैलो के  प्रति क्रूर बताते  हुए उस पर प्रतिबंध लगाया था और बैलो के प्रति मानवता पूर्ण व्यवहार का आदेश दिया था।

वहीँ कुछ पत्रकार (धर्म के कालम में “कैपिटल और बोल्ड” में “मूर्खता” लिखनेवाले) जो “मालदा- दंगो” को अभिव्यक्तता की स्वंतंत्रता बताते हुए अभी थकान भी नहीं उतार पाये थे, वे किकु शारदा का बचाव करने जितनी जल्दी मैंदान में उतरे उतनी जल्दी तो उनके चेहरे से नकाब भी नहीं उतरते। वैसे ये पत्रकार अभिव्यक्त्ति की स्वंत्रतता के इतने बड़े पक्षधर हैं की अपने ऊपर सवाल उठाने वाले लोगो को तब तक सोशल मीडिया पर ब्लॉक नहीं करते जब तक “लोग इन” करके  सवाल देख ना ले.

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बाबा जी के समर्थको ने किकु शारदा की गिरफ़्तारी करवा के एक अच्छा काम ये किया हैं की अब बाबाजी की फिल्मे बाबाजी की तुलना में कम घटिया लगेगी और लोग देखने का मन बना सकते हैं। वैसे इस सारे प्रकरण से ये बात सिद्ध हो जाती हैं की बाबाजी जैसे “साधु- संत” लोक कल्याण (चाहे वो फ़िल्मी मनोरंजन के माध्यम से ही क्यों ना हो) के लिए अपनी सारी प्रतिष्ठा भी दाव पर लगा सकते हैं। वैसे किकु शारदा तो ज़मानत पर छूट गए लेकिन उन्हें गिरफ्तार कराने वाले अपनी “अमानत” बाबाजी की नई फिल्म  के लिए गिरवी रखकर अभी भी बाबा की गिरफ्त में बने हुए।

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